सोमवार, 23 मई 2011

उसकी आँखों को गौर से देखो





 बेवफा रास्ते बदलते है


हमसफ़र साथ चलते है


किसके आसू छिपे है फूलो में

चूमता हू तो होठ जलते है


उसकी आँखों को गौर से देखो

मंदिरों में चराग जलते है


दिल में रहकर नजर नहीं आते

ऐसे कांटे कहा निकलते है


एक दीवार वो भी शीशे की

दो बदन पास-पास जलते है


कांच के मोतियों के आसू के

सब खिलौने गजल में ढलते है

                        - बशीर बद्र 

2 टिप्‍पणियां:

  1. Basis badr ji ka to javab nahi ...laajavab

    Mujhe basiir badr saheb ka likha bahut pasand hai

    unki ye gazal meri fav hai ..

    sochaaa nahii.n achhaa buraa dekhaaa sunaa kuchh bhii nahii.n
    maa.ngaa khudaa se raat din tere sivaa kuchh bhii nahii.n

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  2. बहुत सुंदर .
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